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विकास का यह ‘उजला’ पहलू अपने पीछे कितने व्यापक पैमाने पर विनाश का अंधेरा लेकर आया था, हम उसका छोटा-सा जायज़ा लेने दिल्‍ली में स्थित ‘लोकायन’ संस्था की ओर से सिंगरौली गए थे। - Hindi (Elective)

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प्रश्न

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

विकास का यह ‘उजला’ पहलू अपने पीछे कितने व्यापक पैमाने पर विनाश का अंधेरा लेकर आया था, हम उसका छोटा-सा जायज़ा लेने दिल्‍ली में स्थित ‘लोकायन’ संस्था की ओर से सिंगरौली गए थे। सिंगरौली जाने से पहले मेरे मन में इस तरह का कोई सुखद भ्रम नहीं था कि औद्योगीकरण का चक्का, जो स्वतंत्रता के बाद चलाया गया, उसे रोका जा सकता है। शायद पैंतीस वर्ष पहले हम कोई दूसरा विकल्प चुन सकते थे, जिसमें मानव सुख की कसौटी भौतिक लिप्सा न होकर जीवन की जरूरतों द्वारा निर्धारित होती। पश्चिम जिस विकल्प को खो चुका था भारत में उसकी संभावनाएँ खुली थीं, क्योंकि अपनी समस्त कोशिशों के बावजूद अंग्रेजी राज हिंदुस्तान को संपूर्ण रूप से अपनी ‘सांस्कृतिक कॉलोनी’ बनाने में असफल रहा था।
थोडक्यात उत्तर

उत्तर

संदर्भ: उपरोक्त विवरण कक्षा 12 के हिंदी विषय की किताब अंतरा के पाठ जहाँ कोई वापसी नहीं है से लिए गया है जिसके निर्मल वर्मा जी है।

प्रसंग: यहाँ लेखक यह बताना चाहते है कि आज मनुष्य ने विकास के नाम पर किस तरह से पर्यावण प्रदूषण तथा लोगों के विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया, भारत में औधोगिकरण तथा पश्चिम की तुलना की गई है।

व्याख्या: जब भारत को अंग्रेजों से आजादी प्राप्त होती तब भारत में अधिकतर लोग अनपढ़ तथा गरीब होते है जिन्हे पिछले तकरीबन 200 सालों तक स्वतंत्रता का मतलब नहीं पता था। अंग्रेजों द्वार भारत में पश्चिम की संस्कृति को बढ़ावा देने तथा उसे लोगों से पालन करवाने के लिए कई तरीके अपनाये गए लेकिन अंग्रेज अपनी समस्त कोशिशों के बावजूद अंग्रेजी राज हिंदुस्तान को संपूर्ण रूप से अपनी ‘सांस्कृतिक कॉलोनी’ बनाने में असफल रहा था।

भारत की सांस्कृतिक विरासत रिश्तों में जीवित थी, जो मनुष्य को उसकी धरती, उसके जंगलों, नदियों से जोड़ता है। स्वातंत्रयोत्तर भारत की सबसे बड़ी ट्रेजेडी यह नहीं है कि शासक वर्ग ने औद्योगीकरण का मार्ग चुना, ट्रेजडी यह रही है कि पश्चिम की देखा-देखी और नकल में योजनाएँ बनाते समय प्राकृतिक, मनुष्य और संस्कृति के बीच का नाजुक संतुलन किस तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है इस ओर हमारे पश्चिम-शिक्षित सत्ताधरियों का ध्यान कभी नहीं गया। हम बिना पश्चिम को मॉडल बनाए, अपनी शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर, औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप निर्धीरत कर सकते हैं, कभी इसका खयाल भी हमारे शासकों को आया हो, ऐसा नहीं जान पड़ता।

विशेष:

  • उद्देश्यात्मक शैली का उपयोग।
  • भाषा: खड़ी बोली व विषयानुकूल भाषा का प्रयोग किया गया है।
  • रिहंद बांध से विस्थापन की समस्या का वर्णन किया गया।
  • तत्सम, तद्धव शब्दावली की अधिकता है।
  • शैली: विचारात्मक व चिंतनप्रधान।
shaalaa.com

Notes

  • प्रसंग - 2 अंक
  • व्याख्या - 2 अंक
  • विशेष + भाषा - 2 अंक
जहाँ कोई वापसी नहीं
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2022-2023 (March) Sample

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