Advertisements
Advertisements
Question
'इसके सामने निरुद्देश्य कला, विकृति काम-वासनाएँ, अहंकार और व्यक्तिवाद, निराशा और पराजय के 'सिद्धांत' वैसे ही नहीं ठहरते जैसे सूर्य के सामने अंधकार।'
Solution
- प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ रामविलास शर्मा द्वारा लिखित निबंध 'यशास्मै रोचते विश्वम्' से अवतरित है। प्रस्तुत पंक्ति में लेखक साहित्य के विषय में अपने विचार व्यक्त करता है।
- व्याख्या- लेखक साहित्य की विशेषता बताते हुए स्पष्ट करता है कि हमारे साहित्य का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना नहीं है। वह मनुष्य को सदैव बढ़ने की और चलते रहने की शिक्षा देता है। हमारे साहित्य का गौरवशाली इतिहास इस बात का प्रमाण है। हमारी इस परंपरा के समक्ष ऐसी कला जिसमें कोई उद्देश्य न हो, जो काम-वासनाओं की पोषक हो, जिसमें अहंकार तथा व्यक्ति को अधिक महत्व दिया जाए या निराशा और पराजय के भावों का पोषण करे, उसे कोई मान्यता नहीं दी गई है। यह ऐसे ही गायब हो जाती है, जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार गायब हो जाता है। भाव यह है कि वह कला जो मनुष्य को दिशाहीन बना दे, उसका समाज में कोई स्थान नहीं है। उसे हमारे लोगों द्वारा नकारा गया है। हीरे के समान साहित्य की भी सदियों से आवश्यकता बनी रही है।
APPEARS IN
RELATED QUESTIONS
लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से क्यों की है?
'साहित्य समाज का दर्पण है' इस प्रचलित धारणा के विरोध में लेखक ने क्या तर्क दिए हैं?
दुर्लभ गुणों को एक ही पात्र में दिखाने के पीछे कवि का क्या उद्देश्य है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
''साहित्य थके हुए मनुष्य के लिए विश्रांति ही नहीं है। वह उसे आगे बढ़ने के लिए उत्साहित भी करता है।'' स्पष्ट कीजिए।
''मानव संबंधों से परे साहित्य नहीं है।'' इस कथन की समीक्षा कीजिए।
'पंद्रहवीं-सोलहवीं' सदी में हिंदी-साहित्य ने कौन-सी सामाजिक भूमिका निभाई?
साहित्य के 'पांचजन्य' से लेखक का क्या तात्पर्य है? 'साहित्य का पांचजन्य' मनुष्य को क्या प्रेरणा देता है?
साहित्यकार के लिए स्रष्टा और द्रष्टा होना अत्यंत अनिवार्य है, क्यों और कैसे?
कवि-पुरोहित के रूप में साहित्यकार की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
पाठ में प्रतिबिंब-प्रतिबिंबित जैसे शब्दों पर ध्यान दीजिए। इस तरह के दस शब्दों की सूची बनाइए।