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Question
'साहित्य समाज का दर्पण है' इस प्रचलित धारणा के विरोध में लेखक ने क्या तर्क दिए हैं?
Solution
'साहित्य समाज का दर्पण है' इस प्रचलति धारणा के विरोध में ये तर्क दिए हैं-
- साहित्य में यदि ताकत होती तो संसार को बदलने की सोच तक न उठती।
- ट्रेजडी को दिखाते समय मनुष्य को असल ट्रेजडी से कुछ अधिक दिखाया जाता है। यही बात इसका खण्ड करती है।
- कवि अपनी रुचि के अनुसार संसार को बदलता रहता है। अतः ऐसा साहित्य समाज का दर्पण नहीं हो सकता है। जहाँ पर कवि की रुचिता चले। संसार किसी की रुचिता नहीं है।
- जब कोई समाज के व्यवहार से असंतुष्ट होता है, तब वह संसार को बदलता या नए संसार की कल्पना करता है। अतः इस भावना से बना साहित्य समाज का दर्पण कैसे हो सकता है।
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