Advertisements
Advertisements
प्रश्न
'साहित्य समाज का दर्पण है' इस प्रचलित धारणा के विरोध में लेखक ने क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर
'साहित्य समाज का दर्पण है' इस प्रचलति धारणा के विरोध में ये तर्क दिए हैं-
- साहित्य में यदि ताकत होती तो संसार को बदलने की सोच तक न उठती।
- ट्रेजडी को दिखाते समय मनुष्य को असल ट्रेजडी से कुछ अधिक दिखाया जाता है। यही बात इसका खण्ड करती है।
- कवि अपनी रुचि के अनुसार संसार को बदलता रहता है। अतः ऐसा साहित्य समाज का दर्पण नहीं हो सकता है। जहाँ पर कवि की रुचिता चले। संसार किसी की रुचिता नहीं है।
- जब कोई समाज के व्यवहार से असंतुष्ट होता है, तब वह संसार को बदलता या नए संसार की कल्पना करता है। अतः इस भावना से बना साहित्य समाज का दर्पण कैसे हो सकता है।
APPEARS IN
संबंधित प्रश्न
लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से क्यों की है?
दुर्लभ गुणों को एक ही पात्र में दिखाने के पीछे कवि का क्या उद्देश्य है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
''साहित्य थके हुए मनुष्य के लिए विश्रांति ही नहीं है। वह उसे आगे बढ़ने के लिए उत्साहित भी करता है।'' स्पष्ट कीजिए।
''मानव संबंधों से परे साहित्य नहीं है।'' इस कथन की समीक्षा कीजिए।
'पंद्रहवीं-सोलहवीं' सदी में हिंदी-साहित्य ने कौन-सी सामाजिक भूमिका निभाई?
साहित्य के 'पांचजन्य' से लेखक का क्या तात्पर्य है? 'साहित्य का पांचजन्य' मनुष्य को क्या प्रेरणा देता है?
साहित्यकार के लिए स्रष्टा और द्रष्टा होना अत्यंत अनिवार्य है, क्यों और कैसे?
कवि-पुरोहित के रूप में साहित्यकार की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
'इसके सामने निरुद्देश्य कला, विकृति काम-वासनाएँ, अहंकार और व्यक्तिवाद, निराशा और पराजय के 'सिद्धांत' वैसे ही नहीं ठहरते जैसे सूर्य के सामने अंधकार।'
पाठ में प्रतिबिंब-प्रतिबिंबित जैसे शब्दों पर ध्यान दीजिए। इस तरह के दस शब्दों की सूची बनाइए।