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'पंद्रहवीं-सोलहवीं' सदी में हिंदी-साहित्य ने कौन-सी सामाजिक भूमिका निभाई? - Hindi (Elective)

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प्रश्न

'पंद्रहवीं-सोलहवीं' सदी में हिंदी-साहित्य ने कौन-सी सामाजिक भूमिका निभाई?

दीर्घउत्तर

उत्तर

पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी हिंदी-साहित्य काल में साहित्य का स्वर्णिम युग माना जाता है। इस काल में जितना उच्चकोटि का साहित्य मिलता है, उतना शायद ही और किसी युग में मिले। इस समय में सबसे अधिक संत कवि हुए। ये कवि मात्र भक्ति के कारण उदय नहीं हुए थे। समाज में बाहरी शासकों के शासन से जो अशांति, असंतोष, दुख, कष्ट, धार्मिक तथा जाति भेदभाव, आडंबरों इत्यादि के कारण उत्पन्न हुए थे। तब ऐसे संत कवियों का उदय हुआ जिन्होंने न केवल जनता को सुख दिया अपितु समाज में व्याप्त इन कुसंगतियों को हटाने का भी प्रयास किया। इसमें कबीर, तुलसी, सूरदास, मीरा, रसखान, नानक, घनानंद, नंददास, रहीम, नरोत्तमदास इत्यादि बहुत से कवि हुए हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं से ऐसा ज़ोरदार प्रहार किया कि समाज में व्याप्त आडंबर तथा भेदभावों की नींव हिल पड़ी। इन्होंने समाज में सच्ची भक्ति, मनुष्यता के भाव को स्थान दिया तथा लोगों को इन्हें अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनकी रचनाओं ने जनता में आशा, प्रेम, प्रसन्नता, सुख इत्यादि का संचार किया। इस प्रकार समाज मुक्ति की ओर अग्रसर हुआ और लोगों में नई चेतना जागृत हुई। अपनी संस्कृति के प्रति आदर भाव बढ़ा। स्वयं के अस्तित्व को लेकर बढ़ रही भ्रांति समाप्त हुई। ईश्वर के प्रति आस्था बलवान हुई। जीवन की नयी राह प्रदान हुई।
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यथास्मै रोचते विश्वम्
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पाठ 2.08: रामविलास शर्मा (यथास्मै रोचते विश्वम्) - प्रश्न-अभ्यास [पृष्ठ १४५]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Hindi - Antara Class 12
पाठ 2.08 रामविलास शर्मा (यथास्मै रोचते विश्वम्)
प्रश्न-अभ्यास | Q 6. | पृष्ठ १४५

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