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प्रश्न
उत्तर
- प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ रामविलास शर्मा द्वारा लिखित निबंध 'यशास्मै रोचते विश्वम्' से अवतरित है। प्रस्तुत पंक्ति में कवि द्वारा रचित सृष्टि के विषय में लेखक अपने विचार व्यक्त करता है।
- व्याख्या- लेखक कहता है कि एक कवि द्वारा रचना के समय जो कल्पना की जाती है, वे बिना आधार के नहीं होती है। अर्थात वह जो देखता है, समझता है, सोचता है, उसे आधार बनाकर एक नई सृष्टि की रचना करता है। अब प्रश्न उठता है कि उसे ऐसी सृष्टि की रचना करने की आवश्यकता क्यों पड़ी होगा? तो इसका उत्तर है कवि जहाँ कल्पनालोक का वासी है, वहीं हकीकत के धरातल में भी उसके पैर भली प्रकार से टिके होते हैं। समाज में व्याप्त विसंगति, कुरीतियों, सड़ी-गड़ी परंपराओं से आहत कवि अपनी कल्पना से ऐसे समाज या ऐसी सृष्टि की रचना करता है, जो इनसे मुक्त होती है। साधारण मनुष्य भी इस प्रकार की विसंगति, कुरीति, सड़ी-गली परंपराओं, धारणाओं इत्यादि से प्रताड़ित होता है। अतः जब वह एक कवि की रचना पड़ता है, तो जिस समाज या सृष्टि की कल्पना उसने अपने मन में की हो वह साकार हो जाती है। वह बिलकुल कवि की कल्पना से न मिले लेकिन कहीं-न-कहीं कवि की रचना के समान वह हमें प्रिय होती है। हम भी वही चाहते हैं, जो एक कवि चाहता है। भाव यह है कि कवि जो रचना बनाता है, उसके पात्र यथार्थ जीवन के पात्र अवश्य होते हैं लेकिन उसमें कल्पना का भी समावेश होता है। वह ऐसी रचना होती है, जिसे पढ़कर पाठक को लगता है, जैसे मानो वह रचना उसके जीवन को उद्देश्य बनाकर लिखी गई है। उसकी समस्याओं की वह नकल है और उसमें व्याप्त हल उसके जीवन में व्याप्त समस्याओं का हल दे रहे हैं।
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