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भरत के त्याग और समर्पण के अन्य प्रसंगों को जानिए। - Hindi (Elective)

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प्रश्न

भरत के त्याग और समर्पण के अन्य प्रसंगों को जानिए।

संक्षेप में उत्तर

उत्तर

यह सब जानते हैं कि भरत ने अयोध्या के राजसिंहासन पर राम के स्थान पर कभी न बैठने का निश्चय किया था। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने राम की खड़ाऊ को उनके स्थान पर सुसज्जित कर राम के वापस आने तक अयोध्या का शासन चलाया था। जब तक राम वापस नहीं आए उन्होंने स्वयं को दोषी मानते हुए राजमहल की सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया और वनवासियों की तरह नगर से बाहर चौदह वर्षों तक झोपड़े में रहते हुए जीवनयापन किया। उनका मानना था कि उनके मोह में आकर कैकयी ने राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया था। अतः वही माता के द्वारा किए पाप का पश्चाताप करेगें और राम-लक्ष्मण तथा सीता के जैसा ही कष्टप्रद जीवनयापन करेगें। इसके साथ ही उन्होंने यह प्रण लिया था कि यदि राम चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या का राजपाठ नहीं संभालेगें, तो उसी क्षण वह अपने प्राणों का त्याग कर देगें। भरत एक आदर्श भाई थे। जिन्होंने सौतेलेपन की परिभाषा बदल दी और पूरे भारत में अपना नाम अमर कर दिया।

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भरत-राम का प्रेम
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अध्याय 1.07: तुलसीदास (भरत-राम का प्रेम, पद) - प्रश्न-अभ्यास [पृष्ठ ४६]

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एनसीईआरटी Hindi - Antara Class 12
अध्याय 1.07 तुलसीदास (भरत-राम का प्रेम, पद)
प्रश्न-अभ्यास | Q 2. | पृष्ठ ४६

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पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।

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कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।

एहि ते अधिक कहौं मैं काहा॥


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निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए -

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥
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