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'महीं सकल अनरथ कर मूला' पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए। - Hindi (Elective)

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प्रश्न

'महीं सकल अनरथ कर मूला' पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए।

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उत्तर

प्रस्तुत पंक्ति में भरत स्वयं के प्रति अपना दृष्टिकोण अभिव्यक्त करते हैं। भरत मानते हैं कि इस पथ्वी में जितना भी अनर्थ हो रहा है, वे इन सबके मूल हैं। अर्थात उनके कारण ये सब घटनाएँ घट रही हैं। इस प्रकार वे स्वयं को दोषी मानते हुए दुखी हो रहे हैं। ऐसा प्रतित होता है मानो वे अपराध बोध के नीचे दबे हुए हैं, जिसका बोझ उन्हें असाध्य दुख दे रहा है। उनके मन में किसी के लिए भी बैरभाव तथा कलुषित भावना विद्यमान नहीं है। जो हुआ है वे स्वयं को इस सबका ज़िम्मेदार मानते हुए माता कैकेयी को कहे कटु शब्दों के लिए भी दुख प्रकट करते हैं। इससे पता चलता है कि भरत सच्चे, क्षमाशील और सहृदय व्यक्ति हैं।

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भरत-राम का प्रेम
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अध्याय 1.07: तुलसीदास (भरत-राम का प्रेम, पद) - प्रश्न-अभ्यास [पृष्ठ ४५]

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एनसीईआरटी Hindi - Antara Class 12
अध्याय 1.07 तुलसीदास (भरत-राम का प्रेम, पद)
प्रश्न-अभ्यास | Q 4. | पृष्ठ ४५

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पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।

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कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।

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निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए -

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥
मो पर कृपा सनेहू बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥

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