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प्रश्न
भरत का आत्म परिताप उनके व्यक्तित्व के किस पक्ष की ओर संकेत करता है? वर्तमान में ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता सिद्ध कीजिए।
उत्तर
माता कैकेयी ने पुत्र मोह में आकर राम को चौदह वर्ष के लिए वनवास और भरत के लिए अयोध्या का राज्य माँगा था। कैकेयी की इस भयंकर भूल के कारण राम को चौदह वर्ष के लिए वन को जाना पड़ा तथा पिता इस दुख में अस्वस्थ्य हो गए। लोगों ने इन सबके लिए भरत को ही दोषी माना। भरत माँ की इस गलती के लिए स्वयं परिताप करते हैं। उनका मानना है कि इस भूल के दोषी वहीं है क्योंकि यदि वह नहीं होते, तो माता ऐसा कभी नहीं करती। इस तरह वह माँ पर दोषारोपण नहीं करते। वे जो घटित हुआ उसे अपने पूर्व जन्म का पाप मानते हैं। माँ की गलती का दोष स्वयं लेकर वह स्वयं साधु भी नहीं बनना चाहते हैं। वर्तमान में, ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता है जो यही आत्म-परिताप को समझते हैं और इसके साथ सौहार्दपूर्ण और सही तरीके से निपट सकते हैं। यह व्यक्तित्व धार्मिकता, सामाजिक सद्भाव, अध्ययन, और आत्म-समर्पण की भावना के साथ हो सकता है, ताकि व्यक्तित्व को संतुलित और सुखमय बनाया जा सके।
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पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।
नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।
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महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥ |
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए -
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥ कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥ मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥ मो पर कृपा सनेहू बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥ |