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लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए। - Hindi (Elective)

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Question

लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।
Long Answer

Solution

स्वार्थ हमें गलत मार्गों पर ले जाता है। इस स्वार्थ के कारण ही मनुष्य ने गंगनचुम्बी इमारतें खड़ी की हैं, सागर में बड़े-बड़े पुल बनाए हैं, सागर में चलने वाले जहाज़ बनाए, हवा में उड़ने वाला विमान बनाया है। हमारे स्वार्थों की कोई सीमा नहीं है। जिजीविषा के कारण ही हम जीने के लिए प्रेरित होते हैं। लेकिन स्वार्थ और जिजीविषा ही हैं, जो हमें गलत मार्ग में ही ले जाते हैं। इन दोनों के कारण ही हम स्वयं को महत्व देते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। लेखक इन दोनों से अलग शक्ति को स्वीकार करता है। उसके अनुसार सर्व वह शक्ति है, जो सबसे बड़ी है। जब मनुष्य इस सर्व शक्ति को स्वीकार करता है, तो वह मानव जाति ही नहीं बल्कि इस पृथ्वी में विद्यमान सभी जातियों का कल्याण करता है। कल्याण की भावना उसे महान बनाती है। यह ऐसी प्रचंडता लिए हुए है कि जो मनुष्य को मज़बूत और निस्वार्थ बना देती है। उसमें अहंकार, लोभ-लालच, स्वार्थ, क्रोध इत्यादि भावनाओं का नाश हो जाता है। जो उभरकर आता है, वह महान कहलाता है। इतिहास में इसके अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। बुद्ध, गुरूनानक, अशोक, महात्मा गांधी इत्यादि।
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कुटज
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Chapter 2.1: हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज) - प्रश्न-अभ्यास [Page 168]

APPEARS IN

NCERT Hindi - Antara Class 12
Chapter 2.1 हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज)
प्रश्न-अभ्यास | Q 8. | Page 168

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'नाम' क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।


'कुट', 'कुटज' और 'कुटनी' शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।


कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?


'कुटज' हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।


कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?


कुटज क्या केवल जी रहा है- लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?


'कुटज' पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।'

निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
'कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतर गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।'


निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे 'सोशल सैक्शन' कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!'


निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
'रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।' 


निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलति न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिलती है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!'


कुटज को 'गाढ़े का साथी' क्यों कहा गया है?


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