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Question
निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
'कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतर गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।'
Solution
- प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ हजारी प्रसाद द्वविवेदी द्वारा रचित निबंध कुटज से लिया गया है। इसमें लेखक कुटज की विशेषता बताते है। दूसरी ओर वह ऐसे लोगों की और संकेत करता है, जो स्वभाव से बेशर्म होते हैं लेकिन ये बेशर्मी उसकी विकट परिस्थितियों से लड़ने का परिणाम होती है।
- व्याख्या- लेखक इन पंक्तियों के माध्यम से कुटज तथा ऐसे लोगों के बारे में बात करता है, जो बेहया दिखाई देते हैं। लेखक कहता है कि कुटज ऐसे वातावरण में सिर उठाकर खड़ा है, जहाँ अच्छे-अच्छे धराशायी हो जाते हैं। वह पहाड़ों की चट्टानों पर पनपने के साथ-साथ उनमें विद्यमान जल स्रोतों से अपने लिए पानी की व्यवस्था भी कर लेता है। लोग फिर उसके इस प्रकार के खड़े रहने के स्वभाव को बेहया का उदाहरण ही क्योंन मान लें। यह स्वभाव उनकी विकट परिस्थितियों से लड़ने का परिणाम है। अतः वह उनके स्वभाव में दिखता है। ऐसे ही कुछ लोग होते हैं जीवन में विकट परिस्थितियों से गुजरते हैं और डटकर खड़े रहते हैं। उनके इस स्वभाव को लोग बेहया होने का प्रमाण मानते हैं। उनका यही स्वभाव उनकी रक्षा करता है और उन्हें मजबूती से खड़े रखने में सहायता करता है। ऐसे लोग अपना रास्ता स्वयं खोजते हैं।
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'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे 'सोशल सैक्शन' कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!'
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निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
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