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Question
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-
हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलति न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिलती है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!'
Solution
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ हजारी प्रसाद द्वविवेदी द्वारा रचित निबंध कुटज से लिया गया है। लेखक इन पंक्तियों में कुटज की विशेषता बताते हैं।
व्याख्या- प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक कुटज की विशेषता बताता है। यह कैसा हृदय है, जो कभी पराजय नहीं होता। वह सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय भावों की स्थिति में भी समान भाव से रहता है। अर्थात उसका इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उनका हृदय यदि इस गुण से व्याप्त है, तो वह बहुत ही विशाल है। वह दृढ़ होकर खड़ा रहता है। ऐसे उसे कुटज को देखकर लगता है। उसे देखते ही वह रोमांच भाव से भर जाता है। वह विकट परिस्थितियों में भी सिर उठाकर खड़ा है। उसकी स्थिति देखकर पता चलता है कि वह प्रसन्न है। यह उसके हरे-भरे रूप को देखकर ज्ञात हो जाता है। लेखक को उसके निडर, कभी न हारने वाले स्वभाव तथा अविचल स्वभाव से झलकता है। वह विशाल जीवन दृष्टि लिए हुए है, जो उसे कभी हारने नहीं देती।
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